केतु दूसरे भाव में

केतु पहले भाव में

द्वितीय (धन भाव)- इस भाव में केतू जातक को डरपोक, मुखरोगी व हर किसी का विरोध करने वाला बनाता है। जातक पापी स्वभाव, कटु बोलने वाला, नीच संगति व व्यर्थ का व्यय करता है। ऐसा जातक अधिकतर गुपत रूप अथवा छलकपट अथवा राजदण्ड से हानि उठाता है। मुख रोग से पीड़ित, दुःखी, भाग्यहीन के साथ स्त्री सुख भी अल्पमात्रा में प्राप्त करने वाला होता है। इस भाव में केतू यदि मेष, मिथुन, कन्या अथवा धनु राशि में हो तो जातक मधुर बोलने वाला व सुख देने वाला होता है। केतू यदि पाप प्रभाव में हो तो जातक का जीवन मुश्किल से जाता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी तथ्य वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार केतु के फल में विभिन्नता हो सकती है !