केतु नौवे भाव में

केतु नौवे भाव में

नवम (धर्म व भाग्य भाव)- इस भाव में केतू होने से जातक सुख प्राप्ति का तो इच्दुक होता है परन्तु वह धर्म में कम रुचि रखता है। तीर्थ यात्रा का योग बहुत बनता है। सदैव दूसरों की बुराई करते रहने के कारण अपयश भी बहुत भोगता है, इसलिये ऐसे लोग जितना भी दान धर्म करते हैं, उसको लोग ढोंग समझते हैं। उसके कार्य भी ऐसे होते हैं जिनका कोई मतलब नही होता है अर्थात् व्यर्थ के कामों पर अधिक ध्यान देता है व नीच लोगों की संगति अच्छी लगती है, क्योंकि यह लोग जुआ खेलने में बहुत रुचि रखते हैं। ऐसे लोग पिता के लिये बहुत अरिष्टकारक होते हैं।

इस केतू के प्रभाव से जातक अपनी संतान की बहुत चिन्ता करता है जिसमें उसके संतान होती ही नहीं है या फिर हो कर मर जाती है अथवा संतान उसका अपमान करती है। इसका कारण शायद यह भी हो सकता है कि जिस प्रकार से केतू के कारण जातक के पिता को अरिष्ट होता है तो वही बात जातक के मन में बैठ जाती है कि शायद ऐसा ही मेरे साथ होगा। ऐसे लोग भाइयों से क्लेश करते हैं। ऐसे लोगों का भाग्योदय मलेच्छ लोगों से होता है। केतू यदि शुभ प्रभाव में हो तो अवश्य शुभ फल प्राप्त होते हैं जिसमें जातक समस्त प्रकार के ऐश्वर्य का भोग करता है तथा धन के साथ यश, मान-सम्मान सभी प्राप्त करता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी तथ्य वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार केतु के फल में विभिन्नता हो सकती है !