गुरु कुंडली के दसवे भाव में

गुरु कुंडली के दसवे भाव में

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दशम (पिता व कर्म भाव)- यहाँ भी नैसर्गिक रूप से केन्द्राधिपति दोष से दूषित रहता है परन्तु यदि गुरु की सेवा की जाये अथवा आवश्यकता होने पर रत्न धारण किया जाये तो जातक अवश्य ही धनवान, राज्य में सम्मान प्राप्त करने वाला, अच्छे चरित्र का तथा अपने साथ पिता के नाम को भी यश देता है। ऐसा जातक स्वयं के पुरुषार्थ से ही सभी प्रकार की सुविधायें प्राप्त करता है। उसके पास उच्च स्तर के वाहन तथा सीाी प्रकार की सुविधायें होती हैं।

यहाँ पर कुछ ज्ञानियों के मत अलग हैं। यहाँ तक तो सबका मत एक ही है कि जातक अत्यधिक सुविधा सम्पन्न तथा धनी होता है परन्तु यह सब उसको अपने पिता से प्राप्त होता है। यहाँ का गुरु जातक को सत्कार्य से युक्त, पुण्यात्मा, धार्मिक स्वभाव का, प्रत्येक क्षेत्र में लाभ प्राप्त करने के साथ जातक अपने माता-पिता का भक्त होता है। शत्रु भी उससे भय खाते हैं लेकिन उसमें एक कमी यह होती है कि वह प्रत्येक क्षेत्र में अपने विचार रखता है अर्थात् स्वतंत्र विचारों वाला होता है। ऐसा व्यक्ति अहिंसा प्रिय, अति महत्त्वाकांक्षी तथा अपने रहन-सहन को सदैव उच्च स्तरीय रखता है। मैंने अपने अनुभव में देखा है कि उपरोक्त सभी बातें गुरु के शुभ प्रभाव में होने पर होती है। यदि गुरु किसी पाप प्रभाव में हो तो जातक को अपने भाइयों तक से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है।

जातक का गुरु किसी भी स्थिति में हो, लेकिन वह अपनी माता को देवी समान पूजता है। मैंने अपने शोध में एक बात और देखी है कि गुरु यदि कर्क, मिथुन, तुला, कुंभ अथवा वृश्चिक राशि में हो तो बचपन से ही जातक के कन्धों पर जिम्मेदारी आ जाती है अर्थात् कम आयु में ही उसके पिता का देहान्त हो जाता है। मैंने यह योग 85 प्रतिशत घटित होते देखा है। अगर पिता की पत्रिका के आधार पर वह जीवित रहे तो फिर उसका अपने पुत्र से विवाद रहता है। इस पर भी यदि किसी अन्य शुभ योग से उनमें विवाद न हो तो दोनों यदि एक साथ कोई कार्य करें तो उसमें वह असफल रहते हैं।

उनके किसी कार्य से उन्हें राज दण्ड अथवा बदनामी भी मिल सकती है। अलग-अलग होते ही वह सफल होने लगते हैं। यहाँ पर गुरु यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक के संतान कम होती है। स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में गुरु के प्रभाव से संतान अधिक हो सकती है। ऐसे जातक यदि सरकारी ठेके जिनमें उच्च अधिकारी की मदद की आवश्यकता होती है अथवा शिक्षा के क्षेत्र, स्वतंत्र व्यवसाय के साथ आयात-निर्यात में भी सफल हो सकते हैं। मैंने अपने शोध में इस भाव के गुरु में भी देखा है कि हमें यदि गुरु से उपरोक्त लाभ प्राप्त करने हें तो अवश्य ही गुरु रत्न धारण करना होगा अथवा गुरु की पूजा-अर्चना करनी होगी अन्यथा हानि के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

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