शनि ग्यारहवे भाव में

शनि ग्यारहवे भाव में

एकादश (आय भाव)- इस भाव में शनि अधिकतर शुभ फल प्रदान करता है। जातक दीर्घायु होता है, कन्या सन्तति अधिक व पुत्र सुख से वंचित होता है। व्यवसाय में सफल, शीघ्र क्रोधी, आर्थिक रूप समृद्ध, भाग्यशाली तथा ईश्वर में विश्वास करने वाला होता है। इस शनि पर मेरा अनुभव यह कहता है कि ऐसा जातक धन कमाने में चतुराई रखता है। वह धन कमाने के लिये मार्ग तो सही रखता है परन्तु विधान गलत होता है। आप यह कह सकते हैं कि व्यक्ति इस प्रकार से धन लेगा कि देने वाला अपनी शुखी से धन देकर जायेगा परन्तु मार्ग गलत होगा। इसमें एक उदाहरण रिश्वत भी होता है।

ऐसा जातक शनि के शुभ होने की स्थिति में 35 वर्ष की आयु के पश्चात् जीवन में स्थिरता अनुभव करता है। अपने जीवन में बहुत मेहनत करता है। शनि पाप प्रभाव में होने पर वह प्रेम प्रसंग में अपने ही मित्र से धोखा उठाता है। ऐसा जातक अपने जीवन के आरम्भ में दुःख व अन्तिम 20 वर्ष में बहुत सुख उठाता है। इसमें भी यदि शनि लग्नेश तुला, मकर, धनु अथवा कुंभ राशि में हो तो अधिक शुभ प्रभाव देता है। किसी व्यसन के कारण जातक धन संचय में असमर्थ होता है लेकिन उसका कोई कार्य रुकता नहीं है। शनि लग्नेश व धनु राशि के अतिरिक्त संतान पक्ष के लिये कष्टकारी होता है। यदि जीवनसाथी की पत्रिका में संतान पक्ष प्रबल है तो ठीक अन्यथा समस्या अधिक होती है।

पुरुष की पत्रिका में पत्नी का बन्ध्यत्व हो सकता है, लेकिन एक बात तो पक्की होती है कि शनि लग्नेश होने से संतान समय पर होती है अन्यथा संतान प्राप्ति में विलम्ब तो अवश्य ही होता है। कर्ज के प्रति भी मैंने एक बात स्पष्ट देखी है कि शनि इस भाव में किसी भी राशि में क्यों न हो, जातक किसी से कर्ज लेता है तो वह कर्ज चुका पाने की स्थिति में नहीं होता है अथवा चुकाना नहीं चाहता है। सब कुछ होते हुए भी वह कर्ज मुक्त नहीं हो पाता है। कर्ज के लिये यदि कुर्की जैसी स्थिति आ जाये तो फिर कर्ज चुकाने का प्रयास करता है व चुका देता है। शनि मिथुन, सिंह अथवा धनु राशि में पुत्र संतान होने ही नहीं देता है। किसी अन्य राशि में हो तो पुत्र बड़ा होकर अपने पिता से मानसिक विरोध रखता है।

शनि यदि सूर्य अथवा चन्द्र से अशुभ योग बनाये तो जातक बिलकुल दरिद्र होता है। शनि यदि द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु व मीन) राशि में हो तो जातक जीवन पर्यन्त संघर्ष करता है। शनि के साथ कोई पाप ग्रह हो अथवा शुभ ग्रह पाप प्रभाव में हो तो जातक का धन उसके मित्र वर्ग के माध्यम से समाप्त होता है। यहाँ पर शनि किसी भी राशि में हो परन्तु आयु के 35वें वर्ष में दुर्घटना के माध्यम से विकलांगता देता है जिसमें बायें घुटने व कमर में अधिक चोट आती है। यदि केतू लग्न में बैठा हो तो साथ ही चेहरे पर चोट आती है, दुर्घटना भी अधिक होती है। यदि शनि लग्नेश हो तो चोट बड़ी अवश्य लगती है परन्तु जीवन सुरक्षित रहता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है ! कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलों में विभिन्नता हो सकती है !