शनि चौथे भाव में

चतुर्थ (सुख भाव)- इस भाव के शनि के प्रभाव से जातक कमजोर शरीर का, शीघ्र ही क्रोध करने वाला, समाज में बदनाम तथा कपटी विचार वाला होता है। ऐसा जातक उदर रोग से पीड़ित, अपने माता-पिता से विरोध रखने वाला, बाल्यकाल में रोगी, संकीर्ण विचारवान, कठोर स्वभाव, गृहस्थ जीवन में प्रताड़ित, एकांतवासी एवं पुराने मकान में निवास करने वाला होता है।

यहाँ पर शनि यदि स्व क्षेत्री अथवा उच्च का हो तो पंच महायोग में से शश योग का निर्माण होता है जिसके प्रभाव से जातक 35 वर्षायु के बाद ऐसी सफलता प्राप्त करता है कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता है। साथ ही धनवान, सुखी, पुश्तैनी सम्पत्ति प्राप्त करने वाला तथा भूमि अर्थात् खेती, खदान से लाभ प्राप्त करने वाला होता है परन्तु बहुत कंजूस होता है। उसके मस्तिष्क में केवल धन ही होता है। यहाँ का शनि द्विविवाह योग निर्मित करता है। इस घर में शनि यदि पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में हो तो जातक व्यापार में बहुत उन्नति करता है।

मैंने इस शोध में यह देखा है कि ऐसे शनि वाले जातक बड़ी से बड़ी नौकरी करने पर भी केवल सामान्य जीवन व्यतीत करते हें। ग्रन्थों के आधार पर भी एवं अपने अनुभव में भी यह देखा कि जातक भले ही अपने माता-पिता की इकलौती संतान हो तथा सम्पत्ति भी बहुत हो फिर भी वह सम्पत्ति जातक को नहीं मिलती है, भले ही माता-पिता दान कर दें। इसमें मुख्य कारण जातक का अपने माता-पिता से विरोध होता है। ऐसे जातक को सौतेली माता का सुख प्राप्त होता है। वह स्वयं बहुत ही शान्त व गम्भीर होता है। शनि पर यदि किसी पाप ग्रह का प्रभाव हो तो जातक को अपने युवा पुत्र का वियोग सहना होता है। शनि यदि जल अथवा अग्नि राशि में हो तो जातक विज्ञान के विषयों में अधिक रुचि रखता है तथा उच्च शिक्षा भी इन विषयों में ही प्राप्त करता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है ! कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलों में विभिन्नता हो सकती है !