शनि छटे भाव में

षष्ठम (शत्रु व रोग भाव)- इस भाव में ग्रन्थों के आधार पर शनि केवल शत्रुओं से बचाता है तथा शरीर, साँस व गले के रोग से ग्रस्त होता है। ऐसा जातक बहुत भोग करने वाला, शरीर पर किसी प्रकार का चिन्ह, अपने जाति-समाज में विरोध सहने वाला, शक्तिशाली किन्तु आचार-विचारहीन होता है। ऐसे जातक को कोई न कोई व्यसन अवश्य होता है। अपनी आयु का प्रथम भाग बहुत ही कष्ट में व्यतीत करता है।

ऐसे जातक की कोई भी मदद नहीं करता है। वह भी लड़ाई-झगड़ों में अधिक विश्वास करता है। इस भाव का शनि मातृ पक्ष (मामा-मौसी) के लिये अधिक कष्टकारक होता है। शनि पर यदि कोई पाप प्रभाव हो तो जातक को अपनी आजीविका के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे जातक को सदैव गलत कार्यों से दूर ही रहना चाहिये। यदि उसे एक बार कारावास हो गया तो फिर उसका जीवन अंधकार में ही होता है। शनि के साथ लग्नेश भी शुभ प्रभाव में हो तो जातक अत्यधिक धनवान व समस्त प्रकार के वैभव से युक्त होताा है।

ऐसे जातक को डेयरी व्यवसाय अवश्य करना चाहिये। इस व्यवसाय के माध्ये से जातक अपने जीवन व समाज में सभी प्रकार से मान-सम्मान के साथ्ज्ञ आर्थिक रूप से सम्पन्न हो सकता है। कुछ धन संचय भी करना चाहिये अन्यथा आयु के अन्तिम समय में आर्थिक समस्याओं को रूेलना पड़ सकता है। शनि यदि चर राशि (मेष, कर्क, तुला व मकर) में हो तो फेफड़ों में संक्रमण, यकृत व पित्ताशय में कष्ट, अधिक बदनामी के साथ जातक के चित्त में स्थिरता नहीं रहती तथा सभी उसको मूर्ख मानते हैं। शनि यदि स्थिर राशि (वृषभ, सिंह, वृश्चिक व कुंभ) में हो तो जातक को हृदयाघात का भय, मूत्र संस्थान में संक्रमण, श्वास विकास जैसे घातक रोग होते हैं। द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु व मीन) का शनि फेफड़ों में संक्रमण, उदरविकार, भोजन नलिका में संक्रमण, श्वास संक्रमण तथा जोड़ों में दर्द देता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है ! कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलों में विभिन्नता हो सकती है !