शनि तीसरे भाव में

तृतीय (पराक्रम भाव)- इस भाव में शनि के अच्छे फल मिलते देखे गये हैं। ऐसा जातक बहुत ही हिम्मती, विद्वान, निरोगी रहने वाला, सभा में सभी को मोहित करने वाला, भाग्यवान तथा शत्रुओं के लिये काल होता है। ऐसा जातक अपनी युवावस्था में थोड़े कष्ट उठाता है। अपने पड़ोसी व भाई-बहिनों से भी मानसिक मतभेद रखता है। यहाँ पर शनि यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक के भाइयों के लिये कष्टकारक होता है तथा बहिनों को भी उनके दाम्पत्य जीवन में कष्ट देता है। इसमें यदि बहिन विधवा और भाई की मृत्यु हो जाये तो भी कोई बड़ी बात नहीं है। इसलिये जातक को ऐसी स्थिति आने पर बहिनों तथा भाई की पत्नी व बच्चों का भरण-पोषण करना होता है।

शनि यदि स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो भाई की मृत्यु तो नहीं होती परन्तु आपसी विवाद बहुत होते हैं। सम्पत्ति के लिये विवाद हाता है जिसे सुलझाने के लिये न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। सभी भाई यदि एक साथ रहते हैं तो किसी की भी उन्नति नहीं होती तथा संतान बाधा भी आती है। मैंने इस शनि के लिये अपने शोध में स्पष्ट देखा है कि भले ही किसी अन्य योग के प्रभाव से भाइयों में मतभेद न हो परन्तु उन्नति किसी भी नहीं होती है। जैसे ही मैंने स्वयं कुछ उपाय के साथ भाइयों के अलग रहने की व्यवस्था करवाई तो तुरन्त ही शुभ प्रभाव देखने में आया। अलग-अलग रहने की व्यवस्था भी केवल नाम को ही थी कि जैसे विधिवत रूप से कमरे अलग-अलग कर दिये तथा भोजन भी अलग-अलग बनने लगा तो सारे कार्य सिद्ध होने लगे।

यह कार्य केवल शनि के अकेले होने पर ही प्रभाव में आया परन्तु मंगल भी यदि इस भाव में हो तो फिर विवाद होना ही है। ऐसे में मकान की चारदीवारी खिंच कर ही लाभ प्राप्त होगा। यहाँ शनि के साथ राहू भी हो तो जातक उन्नति तो बहुत करता है परन्तु विद्या प्राप्त नहीं हो पाती हे। इस शनि के शोध में यह भी देखा है कि यदि शनि तुला अथवा कन्या राशि में हो तो विवाह के बाद जातक की स्थिति अधिक खराब हो जाती है। चलता उद्योग बन्द हो जाता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है ! कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलों में विभिन्नता हो सकती है !