Breaking News

गुरु कुंडली के ग्यारहवे भाव में

गुरु कुंडली के ग्यारहवे भाव में

Click here to read in english

एकादश (आय भाव)- इस भाव में गुरु कारकत्व दोष से पीड़ित रहता है, क्योंकि गुरु इस भाव का कारक हे, इसीलिये ज्योतिष ग्रन्थों की यह युक्ति यहाँ गलत सिद्ध होती है कि लाभस्थाने ग्रहाःसर्वे बहुलाभप्रदाः अर्थात् एकादश (लाभ) भाव में सभी ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं। मैंने अपने शोध में पाया है कि यदि हम गुरु का उपाय करें तभी गुरु हमें लाभ देंगे।

इस गुरु के लिये ग्रन्थों का कहना है कि जातक राजा के समान धनवान, अपने कुल का कल्याण करने वाला, धर्म कार्यों में लीन, दीर्घायु, सुन्दर, सदैव निरोगी रहने वाला, व्यवसाय में सफल, अल्प सन्ततिवान, राज्य लाभ प्राप्त करने वाला, अपने पराक्रम से शत्रु का नाश करने वाला तथा बहु स्त्री युक्त होता है। यहाँ पर यह सब बातें कुछ पत्रिकाओं में तो ठीक बैठती हैं परन्तु उपाय फिर भी आवश्यक होता है। यदि गुरु इस भाव में धनु राशि में हो तो जातक का बड़ा भाई धनी होगा तथा जातक स्वयं भी गुरु की महादशा आने पर इतनी अधिक उन्नति करेगा कि जितनी उसने अपने जीवन में नहीं की होगी।

यदि महादशा के साथ शनि की साढ़ेसाती भी आरम्भ हो तो जातक एक सफल ज्योतिषी तथा लेखक भी बन सकता है। इसके साथ ही जातक के मन में बड़े-बड़े विचार होते हैं लेकिन वह आर्थिक विवशता के कारण उन्हें पूरा नहीं कर पाता है, जैसे कि वह सोचता है कि गरीबों के लिये कुद कर सकता है लेकिन आर्थिक समस्या सामने आ जाती है। ऐसा जातक स्वप्न बहुत देखता है लेकिन वह केवल स्वप्न ही होते हैं। इस भाव में गुरु यदि सिंह राशि में हो तो संतान पीड़ा होती है। धनु राशि में पुत्र संतान का अभाव रहता है। यहाँ पर गुरु यदि धनु, मीन, कर्क अथवा कन्या राशि में हो तो जातक को संतान अथवा धनवान में से किसी एक का ही सुख प्राप्त होता है।

जब तक उसके पास धन नहीं होता है, तब तक तो संतान सही मार्ग पर चलती है और जब धन आ जाता है तो संतान मार्ग भटक जाती है। इसमें भी पैतृक सम्पत्ति होती तो बहुत है लेकिन वह उसका पूर्ण भोग नहीं कर पाता है, जेसे कोई सम्पत्ति होगी तो उस पर किसी रिश्तेदार का कब्जा होगा। इस कब्जे के कारण जातक को वह सम्पत्ति उसी रिश्तेदार को मिट्टी के भाव बेचनी होती है अथवा किसी सम्पत्ति पर मुकदमा चल रहा होता है तो जातक उससे इतना परेशान हो जाता है कि उसे उसका मोह ही छोड़ना पड़ता है। उसकी वह सम्पत्ति वही लोग हड़प लेते हें जिनसे उसका विवाद होता है। इसके बाद भी जातक के जीवन में नित्य नई समस्यायें आती हैं। यहाँ मैंने एक विशेष बात देखी है कि जातक पर यदि कर्ज हो जाये तो वह कभी उतरता नहीं है।

यदि किसी कर्ज के कारण कारावास की स्थिति बन जाये तो अवश्य कर्ज उतर जाता है। जातक को अपने जीवन के आरम्भ में कई अपमान सहने पड़ते हैं। वह गुरु के उपाय से धन कमाता तो बहुत है लेकिन उसका वह धन किसी भी प्रकार के नशे में चला जाता है। ऐसे जातक को नशे का व्यसन होता है, इसी कारण वह धन जोड़ नहीं पाता है। यहाँ पर गुरु यदि चर राशि (मेष, कर्क, तुला व मकर) में हो तो जातक बहुत अधिक साहसी तथा कार्य कुशल होता है। गुरु यदि द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु व मीन) में हो तो जातक धार्मिक स्वभाव का, ईश्वर से डरने वाला तथा समाज में सम्मानित होता है। यहाँ के गुरु के शोध में एक बात सामान्य देखी है कि गुरु किसी भी राशि में हो, तो जातक को धन, सम्पत्ति अथवा संतान में किसी एक का ही पूर्ण सुख मिलता है।

अगला अध्याय   गुरु कुंडली के बारहवे भाव में

पिछला अध्याय   गुरु कुंडली के दसवे भाव में