JUPITER IN FOURTH HOUSE OF HOROSCOPE

गुरु के प्रभाव कुंडली के चौथे भाव में

वैदिक ज्योतिष के अनुसार गुरु कुंडली के चौथे भाव में क्या फल प्रदान करता है तथा जातक के जीवन पर इसके क्या प्रभाव पड़ते है ?

चतुर्थ (सुख भाव)- इस भाव के गुरु के अच्छे फल अधिक बताये गये हैं। माता का सुख, भूमि-भवन व वाहन, गुहस्थ सुख प्राप्त होते हैं। जातक सभी प्रकार से सुखी होता है तथा राज्य कार्यों से लाभ प्राप्त करने के साथ पैतृक सम्पत्ति में भी वृद्धि करता है। उसकी रुचि अचल सम्पत्ति एकत्रित करने में अधिक होती है। ऐसा जातक मानसिक व शारीरिक दृष्टि से सुन्दर होता है। व्यवसाय अथवा ज्योतिष के क्षेत्र में सफल रहता है। मेरे अनुभव से व्यवसाय तो ठीक है तथा इसमें भी कर्मेश के बल की अधिक आवश्यकता होती है परन्तु ज्योतिष में सफलता संदिग्ध रहती है।

ज्योतिष में सफलता केवल गुरु के आधार पर ही नहीं मिलती है, उसके लिये बुध की भी आवश्यकता होती है। ज्योतिष में रुझान अवश्य होता है। इस गुरु के प्रभाव से संतान प्राप्ति में समय अधिक लगता है। ऐसा व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान बहुत करता है व व्यावहारिक होता है। इस गुरु के प्रभाव से जातक के शत्रु भी उसका सम्मान करते हैं। जातक बहुत ही ज्ञानी, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साथ वेदों का भी ज्ञाता होता है। यहाँ पर वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) राशि में गुरु अधिक संतान देता है। उपरोक्त बातें मैंने ज्योतिष ग्रन्थों के आधार पर लिखी हें परन्तु मैंने स्वयं जो चतुर्थ भाव के गुरु पर शोध किया है उसमें सारे फल एकदम विपरीत निकले हैं।

केवल व्यवसाय में व्यक्ति अवश्य सफल होता है। ऐसा जातक स्थिर सम्पत्ति जोड़ने में रुचि रखता है, यह अवश्य सही है लेकिन गुरु के प्रभाव से वह इसमें भी सफल नहीं होता है। अपनी आयु के मध्य के बाद ही वह अपने रहने लायक निवास बना पाता है। बाकी सारी बातें तभी सत्य होती है जब सम्बन्धित भाव का स्वामी अर्थात् चतुर्थ भाव तथा उसका स्वामी शुभ स्थिति में हो। यहाँ पर दो बातें उपरोक्त फलों को गलत सिद्ध करने में सामने आ रही हैं। प्रथम तो गुरु चतुर्थ भाव में नैसर्गिक रूप से केन्द्राधिपति दोष से दूषित होता है तो वह शुभ फल बिना किसी उपाय के कैसे देंगे? द्वितीय, जैसा ज्योतिष ग्रन्थों में लिखा है कि स्थान हानि करो जीवः अर्थात् गुरु जिस किसी भी स्थान पर बैठते हैं उस भाव की हानि करते हैं, वह चतुर्थ भाव में बैठे हैं तो सुख की ही हानि करेंगे।

इसके साथ ही उपरोक्त फल प्राप्ति के लिये धन की मुख्य आवश्यकता होती है अर्थात् द्वितीय व एकादश भाव जिन्हें हम धन व आय भाव कहते हैं, गुरु ही इन दोनों भाव का मुख्य कारक हे। चतुर्थ भाव में होने से एकादश भाव से तो षडाष्टक ोग तथा द्वितीय भाव से त्रिएकादश योग निर्मित होगा जो कि एक अशुभ योग होता है, तो फिर इन सब बातों से उपरोक्त फल कैसे प्राप्त होंगे? यह हो सकता है कि गु?रु यदि नीच का हो अर्थात् मकर राशि में हो तो अवश्य अच्छे फल प्राप्त हो सकते हैं। यहाँ पर लिखा है कि माता-पिता का सम्मान करता है तो पिता को तो जातक अवश्य सम्मान करता है परन्तु माता से उसका बैर होता है।

Click here to read in english

अगला अध्याय   गुरु कुंडली के पाचवे  भाव में 

पिछला अध्याय    गुरु कुंडली के तीसरे  भाव में 

Support my work by donating on Patreon.
http://patreon.com/astrologersunilkumar/

To book your telephonic astrology consultation with Astrologer Sunil Kumar click the link below
https://astrologyhoroscope.co.in/book-consultation/

To buy certified gemstones click the link below
https://astrologyhoroscope.co.in/buy-gemstones/

Astrologer Sunil Kumar Whatsapp + 91 9915576799

Email – astrologerkumar13@gmail.com

https://astrologyhoroscope.co.in https://www.facebook.com/astrologersunilkumar/