JUPITER IN SIXTH HOUSE OF HOROSCOPE

गुरु के प्रभाव कुंडली के छटे भाव में

वैदिक ज्योतिष के अनुसार गुरु कुंडली के छटे भाव में क्या फल प्रदान करता है तथा जातक के जीवन पर इसके क्या प्रभाव पड़ते है ?

षष्ठ (शत्रु व रोग भाव)- इस भाव में गुरु के शुभ फल अधिक मिलते हैं परन्तु इस गुरु का एक ही अशुभ फल आता है कि जातक मातुल पक्ष (मामा व मौसी) के लिये हानिकारक होता है। ऐसे जातक पर जब भी कोई संकट आता है तो दैवीय कृपा सेह उसे कोई कष्ट नहीं होता है। ऐसा जातक बहुत ही निर्बल होता है परन्तु फिर भी शत्रु नहीं होते हैं। गुरु यदि शत्रु क्षेत्री अथवा वक्री हो तो अवश्य शत्रु हो सकते हैं। वह स्वयं बहुत आलसी होता है। उसकी स्थिर आय होती है। वह बहुत ही हँसी-मजाक में विश्वास करता है। कर्मकाण्ड के क्षेत्र में भी जा सकता है परन्तु अपने ही कर्मों से ही वह अपना अपमान करवाता है।

इस भाव में गुरु जातक को विद्वान, सत्कार्यरत, मधुरभाषी, उदार स्वभाव का बनाता है। पत्रिका में कोई अन्य योग ऐसा हो जिस योग के आधार पर जातक ज्योतिषी बन सके तो इस गुरु के प्रभाव से जातक बहुत ही उच्च स्तर का जयोतिषी बनता है। ऐसे जातक अत्यधिक धैर्यवान होते हैं परन्तु कई लोग उनके इस गुण को उनकी कमजोरी समझ लेते हैं। इसलिये ऐसे लोगों को मित्रता भी सोच-समझ कर करनी चाहिये अन्यथा इन्हें अपने लोगों से ही छल की सम्भावना होती है। ऐसे लोग रोगी भी कम ही होते हैं, परन्तु गुरु यदि शनि  की राशि (कुंभ अथवा मकर) में हो तो जब वह बीमार होता है तो अधिक समय के लिये होता है।

यदि राहू की भी दृष्टि होह तो अवधि और अधिक हो जाती है। यहाँ पर गुरु यदि स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो शुभ फल अधिक मिलते हैं। इस घर में गुरु पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि अथवा युति हो तो जातक गाय-भैंस के व्यवसाय से बहुत धन कमाता है। अपने भाईह-बहिनों को बहुत प्रेम करता है। यहाँ पर गुरु यदि मिथुन, तुला, कुंभ व मकर राशि का हो तो जातक अधिकतर )ण से ग्रस्त रहता है। कन्या, मकर व कुंभ राशि के गुरु से भाग्य सम्बन्धी कार्यों में सदैव बाधा आती है तथा भाग्योदय भी बहुत देर से होता है।

यहाँ पर गुरु यदि किसी पापी ग्रह के प्रभाव में हो तथा खानपान भी अनियमित हो तो अवश्य जातक को उदर रोग तथा यकृत के रोग होते हैं लेकिन मेरे अनुभव में उस पापी ग्रह को शान्त कर दिया जाये तो जातक को रोगों से मुक्ति मिल सकती है। यहाँ पर गुरु यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक अपने कर्मों से अशुभ कार्यों में लिप्त होता है। अपने संचित धन को जुआ, शराब का सेवन व निम्न स्तरीय महिलाओं में व्यय करता है जिसके कारण उसे गुप्त रोग आदि हो जाते हैं। यहाँ पर मेरा मत थोड़ा भिन्न है, मेरा अनुभव यह कहता है कि सर्वप्रथम ऐसे कर्म केवल पुरुष जातक ही कर सकता है। इसमें भी यदि गुरु की राशि पर कोई पाप ग्रह बैठा हो तथा गुरु के साथ कोई पाप ग्रह बैठा हो तो उसका भी इस भाव में शुभ फल प्राप्त होगा।

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