JUPITER IN TWELFTH HOUSE OF HOROSCOPE

गुरु कुंडली के बारहवें भाव में

वैदिक ज्योतिष के अनुसार गुरु कुंडली के बारहवे भाव में क्या फल प्रदान करता है तथा जातक के जीवन पर इसके क्या प्रभाव पड़ते है ?

द्वादश (व्यय भाव)- इस भाव में गुरु के अशुभ फल ही मिलते हैं। वैसे भी यह व्यय भाव कहलाता है। इस भाव में गुरु के प्रभाव से जातक समाज में अपमानित होता है। संतानहीन, दुष्कर्मों में लिप्त, आलसी, निम्न स्तर की नौकरी करने वाला होता है। इस योग में यदि चतुर्थ भाव एवं चन्द्र दोनों ही पीड़ित हों तो जातक बाल्यकाल से दिल का रोगी होता है। गुरु के शुभ प्रभाव में तथा कारक होने पर जातक सदाचारी, अधिक यात्रा करने वाला, शास्त्रज्ञ, आलसी, मितव्ययी, सम्पादन के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करने वाला, परोपकारी होने के साथ दुष्ट प्रवृत्ति का तथा अत्यधिक लालची होता है।

ऐसा जातक अपने मित्रों के विषय में भाग्यशाली होता है, क्योंकि उसे सभी विश्वस्त मित्र मिलते हैं। वह शुभ कार्यों में अधिक व्यय करता है। ऐसा जातक अपने जीवन में दो विवाह का योग पाता है। अपने जीवन के आरम्भ में संघर्ष करता है तथा जीवन के दूसरे भाग में अवश्य कुछ सुख भोगता है। वह अपने शत्रुओं के लिये काल होता है। इस भाव के गुरु के लिये मैंने जो शोध किया है उसमें कुछ बातें ही ठीक सिद्ध हुई है, शेष में अन्य ग्रहों के प्रभाव से ही फल प्राप्त हुए। ज्योतिष ग्रन्थों में द्वादश भाव में बैठे गुरु के लिये अशुभ फल ही अधिक बताये हैं।

गुरु यदि पाप ग्रह की राशि में अथवा प्रभाव में हो तो जातक घमण्ड में आकर अपनी सामर्थ्य से अधिक व्यय करता है। इसके लिये उसे कर्ज लेना पड़ता है। जैसा कहा है कि जातक अधिकतर शुभ कार्य में अधिक व्यय करता है लेकिन यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि यह सही है कि यह भाव व्यय का है लेकिन यहाँ पर शुभ अथवा अशुभ कैसे आ गया?

यदि गुरु शुभ प्रभाव में हो तो अवश्य शुभ कार्य में व्यय कर सकता है परन्तु अशुभ ग्रह के प्रभाव में गुरु अशुभ व्यय ही अधिक करता है। राहू का प्रभाव इस गुरु पर होने से जातक अपनी आधी से अधिक आय शराब में ही उड़ा देता है। यह सही हे कि जातक अपने शत्रुओं के लिये काल होता है, क्योंकि गुरु अपनी दृष्टि जहाँ डालता है, उस घर को बल देता है, इस प्रकार गुरु यहाँ बैठ कर शत्रु भाव को देखता है और इसीलिये उसके शत्रु उससे भय खाते हैं। ऐसा गुरु जातक को उच्च शिक्षा अवश्य दिलवाता है। इसका कारण शायद यही है कि व्यय भाव में जो भी ग्रह बैठेगा,

वह अपने कारक वस्तुओं का व्यय अधिक करायेगा। गुरु विद्या का कारक होता है तथा वि़द्या का व्यय होने का मतलब है उच्च शिक्षा। यहाँ पर कुछ पत्रिकाओं में मैंने यह भेद देखा है कि गुरु यदि पंचमेश होता है तो जातक और भी अधिक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है और यदि पंचमेश नहीं होता है तो भी उच्च शिक्षा पग्रहण करता है। यदि किसी भी रूप में गुरु, पंचम भाव अथवा उसके स्वामी पर शनि का प्रभाव हो तो अवश्य ही शिक्षा में अवरोध आते हैं। गुरु यदि अकेला 2-5-7 अथवा 11वें भाव में अकेला हो अथवा लग्नेश न होकर किसी केन्द्र स्थान में हो तो अवश्य ही दोष से पीड़ित होता है। उपाय के पश्चात् ही शुभ फल में वृद्धि होती है।

Click here to read in english

अगला अध्याय   शुक्र कुंडली के पहले भाव में 

पिछला अध्याय   गुरु कुंडली के ग्यारहवे  भाव में

Support my work by donating on Patreon.
http://patreon.com/astrologersunilkumar/

To book your telephonic astrology consultation with Astrologer Sunil Kumar click the link below
https://astrologyhoroscope.co.in/book-consultation/

To buy certified gemstones click the link below
https://astrologyhoroscope.co.in/buy-gemstones/

Astrologer Sunil Kumar Whatsapp + 91 9915576799

Email – astrologerkumar13@gmail.com

https://astrologyhoroscope.co.in https://www.facebook.com/astrologersunilkumar/