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गुरु कुंडली के सातवे भाव में

गुरु कुंडली के सातवे भाव में

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सप्तम (जीवनसाथी भाव)- इस भाव के गुरु से जातक को जीवनसाथी सुन्दर मिलता है। वह बहुत उदार होता है। अपने पिता से उच्च पद प्राप्त करता है। जातक विद्वान होने के साथ भाग्यवान भी होता है। वह वक्ता भी बहुत ही अच्छा होता है। ऐसा जातक परदेस में बहुत लाभ प्राप्त करता है। ऐसे लोग धर्म में अधिक रुचि रखते हैं। इनका सम्बन्ध उच्च स्तर के लोगों से होता है।

वह बहुत ही भावुक व अपने कार्य को लगन से करने वाला होता है। ऐसा जातक वैवाहिक जीवन में सुखी होता है। जीवनसाथी के मामले में भी बहुत ही भाग्यशाली होता है, क्योंकि सर्वप्रथम तो उसे विवाह से ही बहुत लाभ होता है अर्थात् पुरुष हो तो उसे दहेज बहुत मिलता है और यदि स्त्री हो तो उसका विवाह अपने घर के स्तर से बहुत ही उच्च स्तर के घर में होता है, जहाँ उसे सभी सुख-सुविधायें मिलती हैं। उसका जीवनसाथी सुन्दर, उदार तथा सदाचारी होता है परन्तु जातक स्वयं सदाचारी नहीं होता है। उसका सम्बन्ध अन्य किसी से होता है। वृश्चिक, वृष, कन्या, मकर व मीन राशि का गुरु वैवाहिहक सुख में बाधक होता है, जिसमें विवाह की इच्छा न होना अथवा सू3र्य का प्रभाव हो तो तलाक की सम्भावना भी होती है अथवा लड़ाई-झगडत्रे तो होते ही रहते हैं। इसमें भी मुख्य कारण जातक ही होता है। इस भाव के गुरु से साझेदारी के व्यापार में बहुत लाभ होता है। यहाँ पर गुरु यदि अष्टम भाव का स्वामी हो तो पुरुष जातक के लिये ठीक नहीं होता है, क्योंकि इस योग से उसकी गर्भवती पत्नी के लिये जान का खतरा होता है।

इस भाव का गुरु यदि कर्क अथवा तुला राशि में हो तो जातक केे दो विवाह का योग होता है। इस भाव में गुरु यदि कर्क अथवा तुला राशि में हो तो जातक के दो विवाह का योग होता है। इस भाव में गुरु यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो शुभ फल अधिक मिलते हैं। जातक अपने परिवार से बहुत प्रेम करता है। स्त्री राशि में गुरु के प्रभाव से अशुभ फल मिलते हैं। स्त्री राशि के गुरु के होने पर जातक अपनेह जीवनसाथी को मात्र भाग की वस्तु समझता है। इसी भावना के अन्तर्गत वह व्यवहार करता है अर्थात् मान-सम्मान नहीं देता है। सप्तम भाव में गुरु यदि मेष, सिंह, मिथुन अथवा धनु राशि में हो तो जातक अच्छी शिक्षा ग्रहण करता है तथा सम्मानीय क्षेत्र में आजीविका ग्रहण करता है। गुरु यदि सिंह, मिथुन अथवा कुंभ राशि में हो तो पुत्र संतान की चिन्ता रहती है। यहाँ भी कारण कुछ भी हो सकता है, संतान हो नहीं अथवा होकर मृत्यु को प्राप्त हो अथवा अयोग्य निकले। मैंने इस भाव के गुरु पर जो अनुभव किया है, उसका परिणाम यह है कि जिसकी पत्रिका में गुरु इस भाव में हो तो जीवनसाथी की सुन्दरता के लिये तो अवश्य ही भाग्यशाली होता है।

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