बुध कुंडली के पाचवे भाव में

बुध कुंडली के पांचवे भाव में

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पंचम (संतान व विद्या भाव)- इस भाव में बुध के शुभ फल अधिक प्राप्त होते हैं। ऐसे जातक समाज में सम्मान पाने के साथ संगीत प्रेमी भी होते हैं, साथ ही विद्वान, सदाचारी, सदैव प्रसन्न रहने वाले तथा श्रमशील होते हैं। यह भाव विद्या का है। किसी भी भाव के स्वामी का द्वादश भाव में जाने पर बहुत अशुभ माना जाता है परन्तु पंचमेश के साथ ऐसा नहीं है। पंचमेश यदि व्यय भाव में जाये तो जातक को कम पढ़ा-लिखा होना चाहिये परन्तु ऐसा होता नहीं है।

मैंने अनेक पत्रिकाओं का अध्ययन किया है जिसमें इस स्थिति वाले जातक अच्छे पढ़े-लिखे निकले। वैसे तो यह फल प्रत्येक पंचमेश के सन्दर्भ में निकला परन्तु गुरु के साथ और भी अच्छा फल प्राप्त हुआ। इसका कारण शायद यही हो सकता है कि किसी भी भाव का स्वामी व्यय भाव में जाने पर उस भाव का व्यय कराता है। विद्या के साथ भी यही होता है। विद्या का अधिक व्यय का मतलब है विद्या की अधिक प्राप्ति होना होता है। गुरु के साथ अधिक इसलिये होता है, क्योंकि गुरु विद्या का नैसर्गिक कारक होता है। इसमें यदि किसी पाप ग्रह का प्रभाव आ जाये तो व्यक्ति का रुझान जुए व सट्टे की ओर भी हो जाता है। बुध यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो व्यक्ति विशेष बुद्धिमान होने के साथ अपनी शिक्षा आयु से पहले ही पूर्ण कर लेता है।स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में बुध कन्या सन्तति अधिक देता है। पृथ्वी तत्व (वृशभ, कन्या व मकर) राशि में बुध व्यक्ति को अधिक क्रोधी के साथ शिक्षा से घृणा कर अधूरी छोड़ने वाला, किसी के भी प्रति उदार न रहने वाला, सभी से झगड़ने वाला परन्तु कभी-कीाी इतना व्यावहारिक हो जाता है कि कोई कार्य करता वह स्वयं है परन्तु जब प्रशंसा मिलती है तो किसी और को आगे कर देता है। ऐसा व्यक्ति संतान की ओर से दुर्भाग्यशाली होता है। उसके ऐसी संतान होती है जो उसके कभी किसी काम नहीं आती है। जल तत्व (कर्क, वृश्चिक व मीन) का बुध जातक को कन्या सन्तति अधिक व पुत्र कम तथा ऐसा देता है कि जातक को लगता है कि ऐसे पुत्र से पुत्रहीन होना अच्छा होता। आजीविका के क्षेत्र में जातक टायपिंग, डिक्शनरी लेखन अथवा हस्तरेखा ज्ञान में अधिक सफल होता है परन्तु स्वार्थी ऊँचे स्तर का होता है। अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) में बुध व्यक्ति को क्रोधी अधिक बनाता है। ऐसे लोगों में केवल क्रोधरूपी अवगुण होता है वरन् अन्य दृष्टि से यह अति मिलनसार, न्यायप्रिय तथा प्रत्येक कार्य को सोच कर करने वाला बनाता है। ऐसे लोग गणित, अंकवेत्ता, लेखाशास्त्र व ज्योतिष में अधिक सफल होते हैं। वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) में होने पर व्यक्ति संतानहीन होता है। यदि जीवनसाथी के योग से संतान हो भी गई तो विकलांग अथवा कमजोर शरीर की होती है। ऐसा व्यक्ति लेखक उच्च स्तर का होता है। लेखन के क्षेत्र में उसकी पाण्डुलिपि प्रकाशित भी होती है। आजीविका की दृष्टि से चिकित्सा अथवा भाषा शास्त्र का क्षेत्र उचित होता है।

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