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राहु कुंडली के आठवे भाव में

राहु आठवे भाव में

अष्टम (मारक भाव)- राहु कुंडली के आठवे भाव में अशुभ फल अधिक देता है। ऐसा जातक अत्यधिक कामी होता है। इस कारण जातक को गुप्त रोग होने की सम्भावना रहती है।जिन जातक का राहु आठवे भाव में हो उन्हें वेश्या से सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए अन्यथा गुप्त रोग अवश्य होता है।राहु आठवे भाव में जातक को गंदे और मलीन विचारो वाला बनता है , ऐसा जातक बात-बात पर क्रोध करता है।परन्तु जातक कठिन परिश्रम अवश्य करता है फिर भी उसे उसका पूर्ण फल नहीं मिलता है। क्योकि राहु की दृष्टि कुंडली के दूसरे भाव पर है इसीलिए ऐसे जातक की मृत्यु विष अथवा दुर्घटना में मूर्छित अवस्था में हो सकती है। यदि राहू अधिक अशुभ प्रभाव में आये तो जातक को गुदा रोग व प्रमेह जैसे रोगों के साथ अत्यधिक शत्रु पीड़ा होती है।राहू यदि मिथुन राशि में हो तो जातक बहुत ही हिम्मत वाला व यश प्राप्त करने वाला होता है। ऐसे जातक का दाम्पत्य जीवन भी सुख में व्यतीत होता है।

राहू यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो जात अधिक अशुभ फल प्राप्त होते हैं। उसे कामी, कलहप्रिय तथा चरित्रहीन जीवनसाथी मिलने की सम्भावना रहती है। वह जातक को इतना अधिक दबा कर रखता है कि वह कुछ बोल भी नहीं पाता है।
पुरुष की पत्रिका में ऐसा राहू हो तो जातक स्वयं धन संग्रह नहीं कर पाता है परन्तु धन का इतना लालची होता है कि धन के लिये वह कुछ भी कर सकता है। यदि सरकारी नौकरी में होता है तो रिश्वत लेता है और पकड़ा जाता है। कारावास भी भोगता है। उसे पत्नी बहुत ही निम्न वर्ग की धनहीन परिवार से मिलती है।
राहु के अशुभ प्रभाव के चलते जातक व्यापर में सफल नहीं होता, ऐसे जातको को राहु के उपाय अवश्य करने चाहिए।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है।

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