राहु चौथे भाव में

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चतुर्थ (सुख भाव)- कुंडली का चौथा भाव माता , विद्या, सुख भाव होता है।यदि राहू इस भाव में हो तो जातक को दुखी, असन्तोष, माता से क्लेश करने वाला, क्रूर स्वभाव, कम बोलने वाला, जूठ बोलने वाला, विदेशी भाषा का ज्ञान, पिता को आर्थिक रूप से हानि देने वाला होता है। राहू चौथे भाव में जातक को विद्या में अवरोध देता है। ऐसा जातक जीवन में एक बार अवश्य अपने घर का त्याग करता है, बचपन में गलत संगत में पड़ने के कारण विद्या में अवरोध उत्त्पन होता है।

राहू यदि स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो जातक व्यापार में सदैव समस्याएं आती है और व्यापार कभी भी सही तरीके से नहीं चलता है।ऐसे जातक को जीवन में कई व्यापार बदलने पड़ते है परन्तु फिर भी सफलता नहीं मिलती। यदि वह किसी के साथ साझेदारी करे तो सफल हो सकता है अथवा नौकरी में सफल होता है। वह गलत कार्य करके अधिक धन अर्जित करता है। ऐसे जातक की संतान भी कम होती है,यदि गुरु का शुभ प्रभाव पाचवे भाव पर हो तो संतान अधिक हो सकती है।

ऐसे जातक का जीवनसाथी बहुत ही अच्छे स्वभाव का होता है परन्तु जातक को उसकी कद्र नहीं होती। यहाँ राहू यदि शनि के साथ योग बनाये तो जातक बहुत गरीब होता है तथा एक पुराने घर में निवास करता है। यदि सूर्य, मंगल, चन्द्र व शनि से योग करे तो जातक पित्त विकार, रक्तपित्त विकार, क्षय रोग, कुष्ठ रोग व अन्य स्नायु विकार होते हैं। राहू यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक का पिता बहुत कष्ट उठाता है। क्योकि राहु की दृष्टि दसवे स्थान अथवा पिता भाव पर पड़ती है इसीलिए पिता को जीवन में अत्यंत कष्ट उठाने पड़ते है, पिता का व्यापार नष्ट हो जातात है अथवा हानि देता है। नौकरी करता हो तो उसे निष्कासित कर दिया जाता है। राहू यदि मेष, सिंह अथवा कंुभ राशि में हो तो सम्पत्ति देता है। संतान के लिये जातक दुःखी रहता है और उसे दूसरा विवाह करने की सम्भावना रहती है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है। कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के आधार पर फल में विभिन्नता हो सकती है।

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