राहु दूसरे भाव में

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द्वितीय (धन भाव)- राहु यदि कुंडली के दित्तीय भाव में स्थित हो तो जातक को विदेश में रहने वाला अथवा परिवार से दूर होता है ! उसके बच्चे कम अथवा परिवार छोटा होता है ! राहु दित्तीय भाव में वाणी को कठोर बनता है क्योकि कुंडली का द्वितीय भाव वाणी भाव भी होता है , धन भाव में राहु के कारन जातक गरीब होता है, बुरे विचार व हकला कर बोलने वाला, और जीवनसाथी की अचानक मृत्यु से दुखी अथवा शीघ्र क्रोधी तथा अचानक चोरी से धनहानि उठाने वाला होता है।

राहू यदि स्थिर राशि (वृषभ, सिंह, वृश्चिक व कुंभ) जातक को संपत्ति का लाभ मिलता है ! अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) राशि में अन्य हानि अधिक होती है।
स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में राहू होने पर जातक अपनी सम्पत्ति गिरवी रखकर अथवा किसी अन्य प्रकार से कोई लघु उद्योग आरम्भ करता है तथा वह इसमें सफल भी होता है। जातक किसी पर फिजूल खर्च नहीं करता किन्तु उसे कंजूस भी नहीं कह सकते क्योंकि वह विशेष अवसर व समय पर खर्च भी करता है। यदि धन व सम्मान में से किसी एक को चुनने को कहा जाये तो वह सम्मान अधिक पसन्द करते हैं। ऐसे जातक वाणी के कठोर होते हैं।

राहू यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक अपने पिता की सम्पत्ति का नाश करता है अथवा किसी अन्य कारण से उसे सम्पत्ति प्राप्त ही नहीं होती है परन्तु उसे किसी न किसी की सम्पत्ति अवश्य मिलती है। पिता के अतिरिक्त किसी अन्य की सम्पत्ति मिलने पर जातक की संतान को दुष्परिणाम भोगने पड़ते हें हालांकि वह सम्पत्ति का भोग अवश्य करता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है !

 

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