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राहु कुंडली के सातवे भाव में

राहु सातवे भाव में

सप्तम (जीवनसाथी भाव)- राहू कुंडली के सातवे भाव में अच्छे फल नहीं देता। यह भाव जीवनसाथी भाव के साथ मारक भाव भी है। इस भाव में राहू के प्रभाव से जातक को जीवनसाथी सदैव अस्वस्थ रहने वाला व क्लेशी प्रवृत्ति का मिलता है।

जातक स्वयं भ्रमणशील, वात रोग से कष्ट, चतुर बुद्धि, लालची प्रवृत्ति व दुराचारी होता हैं। राहु सातवे भाव में जातक को व्यापार में भी असफलता और हानि देता है। क्योकि सत्व भाव हमारे यौन सम्बन्धो को दर्शाता है इसलिए राहु के बुरे प्रभाव से ऐसा जातक सदैव घर के बाहर सम्बन्ध बनाने का इच्छुक होता है।यदि लग्नेश की स्थिति अशुभ हो तो जातक का विवाह किसी अधिक आयु वाले से होने की सम्भावना होती है अथवा जाति व समाज से बाहर वाले के साथ सम्बन्ध होने के कारन समाज में बदनामी होती है।

जातक स्त्री हो अथवा पुरुष, उसके अधिक आयु वाले से अवैध सम्बन्ध अवश्य बनते हैं। सप्तम भाव व उसके स्वामी पर किसी अन्य पापी ग्रह के प्रभाव होने से या तो विवाह न होना, विवाह में विलम्ब अथवा विवाह पश्चात् सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते। इसमें भी यदि राहू मिथुन, कन्या, तुला या धनु राशि में हो तो विवाह की सम्भावना क्षीण होती है। जातक को मधुमेह व प्रमेह जैसे रोग की सम्भावना होती है। जातक की समय के साथ-साथ ख्याति अधिक होती है।

भारतीय ज्योतिष के आधार पर पूर्व जन्म के दुष्कर्म के प्रभाव से जातक को इस जन्म में राहू का यह योग प्राप्त होता है। ऐसे जातक को इस जन्म में दाम्पत्य सुख नहीं मिलता है। इसमें जातक अवैध सम्बन्ध बनाये या फिर किसी अन्य कारण से विवाह हो जाये तो वह गर्भपात अवश्य कराता है। इस राहू के प्रभाव से जातक की नौकरी छूट सकती है अथवा व्यवसाय में हानि हो सकती है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है।

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