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शनि कुंडली के आठवे भाव में

शनि आठवे भाव में

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शनि यदि अष्टम भाव में पाप प्रभाव में हो तो जातक अत्यन्त कंजूस, दूसरों से बिना बात के झगड़ा व जलन करने वाला, व्यर्थ ही इधर-उधर भटकने वाला होता है। यदि चन्द्र व लग्नेश भी पाप प्रभाव में हों तो जातक पागल तक हो सकता है।

ऐसे जातक का अन्तिम समय काफी कष्ट में व्यतीत होता है। लम्बी चलने वाली बीमारी के कारण जातक गरीब हो जाता है, परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में सफल रहता है। ऐसा जातक शिक्षक अथवा किसी संस्थान में शिक्षा देने वाले के रूप में अधिक सफल होता है परन्तु मेष राशि में विशेषकर अधिक अशुभा फल देता है।

कुंडली के अष्टम भाव में शनि जातक को लम्बी उम्र प्रदान करता है परन्तु जातक कपटी,अधिक बोलने वाला, विद्वान, डरपोक, गुप्त रोगी, मोटे शरीर का परन्तु उदार प्रकृति का होता है। अल्प सन्ततिवान, वायु अथवा श्वास विकार से पीड़ित, अधिक आयु के बाद विवाह होता है। विवाह के बाद बहुत ही समस्या ग्रस्त रहने वाला तथा अधिक परिश्रम के बाद भी कम लाभ प्राप्त करने वाला होता है।

ऐसे जातक का कार्य-व्यवसाय भी असफल होता है। जातक का अपने भाई बहनो के साथ मतभेद बना रहता है और उनके साथ रहने पर जीवन में कामयाबी नहीं मिलती !

जातक जीवन में सफलता को अधिक महत्व देता है इसलिए जल्दी विवाह नहीं करता और जब तक सफल हो पाता है विवाह में बहुत विलम्ब हो जाता है !

शनि यदि इस भाव में तुला अथवा वृषभ राशि में बैठता है तो जातक को बहुत ही शुभ फल देता है। शिक्षा के लिये नीलम धारण करना पड़ता है तभी जातक शिक्षा प्राप्त कर पाता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार फल में विभिन्नता हो सकती है !

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