https://astrologyhoroscope.co.in/wp-content/uploads/2018/10/saturn-eleventh-house.png

शनि के प्रभाव कुंडली के ग्यारहवे भाव में

 वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि कुंडली के ग्यारहवे भाव में क्या फल प्रदान करता है तथा जातक पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है ?

शनि यदि कुंडली के ग्यारहवे भाव में हो तो जातक धन कमाने में चतुराई रखता है। अपने व्यापार को चलने की लिए रिश्वत भी देता है ! यदि जातक किसी सरकारी विभाग में हो तो रिश्वत अवश्य लेता है, यदि गुरु का प्रभाव लग्न पर हो तो जातक रिश्वत ठुकरा सकता है ! जातक के जीवन में 35 वर्ष की आयु के पश्चात् जीवन में स्थिरता आती है। जातक मेहनती अवश्य होता है परन्तु प्रेम प्रसंग में धोखा प्राप्त करता है !

कुंडली के ग्यारहवे भाव में शनि अधिकतर शुभ फल प्रदान करता है। जातक की आयु लम्बी होती है, कन्या सन्तति अधिक व पुत्र कम अथवा नहीं होते। व्यापार में सफल,आर्थिक रूप से समृद्ध, भाग्यशाली तथा ईश्वर में विश्वास करने वाला परन्तु अत्यंत क्रोधी होता है।

शनि ग्यारहवे भाव में जीवन के प्रारम्भ में संघर्ष देता है परन्तु अंत के 20 वर्ष में बहुत सुख उठाता है। इसमें भी यदि शनि लग्नेश तुला, मकर, धनु अथवा कुंभ राशि में हो तो अधिक शुभ प्रभाव देता है। किसी व्यसन के कारण जातक धन संचय में असमर्थ होता है लेकिन उसका कोई कार्य रुकता नहीं है।

शनि ग्यारहवे भाव में किसी भी राशि में क्यों न हो, जातक किसी से कर्ज लेता है तो वह कर्ज चुका पाने की स्थिति में नहीं होता है अथवा चुकाना नहीं चाहता है। सब कुछ होते हुए भी वह कर्ज मुक्त नहीं हो पाता है। जातक यदि कर्ज चुकाने की ठान ले तो फिर कर्ज चुकाने का प्रयास करता है व चुका देता है।

शनि ग्यारहवे भाव में संतान पक्ष के लिये कष्टकारी होता है। यदि जीवनसाथी की पत्रिका में संतान के योग अच्छे है तो ठीक अन्यथा समस्या अधिक होती है। लेकिन एक बात तो पक्की होती है कि शनि लग्नेश होने से संतान समय पर होती है अन्यथा संतान प्राप्ति में विलम्ब तो अवश्य ही होता है।

यहाँ पर शनि किसी भी राशि में हो परन्तु आयु के 35वें वर्ष में दुर्घटना से विकलांगता की सम्भावना बनती है, जिसमें बायें घुटने व कमर में अधिक चोट आती है। यदि केतू लग्न में बैठा हो तो चेहरे पर चोट आ सकती है, यदि शनि अशुभ प्रभाव में हो तो अधिक दुर्घटनाये होती है। यदि शनि लग्नेश हो तो दुर्घटना के बाद भी जीवन सुरक्षित रहता है।

शनि यदि द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु व मीन) राशि में हो तो जातक जीवनभर संघर्ष करता रहता है। शनि के साथ कोई पाप ग्रह हो अथवा शुभ ग्रह पाप प्रभाव में हो तो जातक का धन उसके मित्रों के द्वारा अधिक खर्च होता है !

शनि मिथुन, सिंह अथवा धनु राशि में पुत्र संतान होने की सम्भावना कम होती है, यदि हो भी जाये तो पुत्र बड़ा होकर अपने पिता से मानसिक विरोध रखता है। शनि यदि सूर्य अथवा चन्द्र से अशुभ योग बनाये तो जातक बिलकुल दरिद्र होता है।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है , कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है !

Click here to read in english

अगला अध्याय – शनि बारहवे भाव में

पिछला अध्याय – शनि दसवे भाव में