Breaking News

शनि कुंडली के तीसरे भाव में

Click here to read in english

तृतीय (पराक्रम भाव)- कुंडली के तीसरे भाव में शनि अधिकतर अच्छे फल प्रदान करता है। ऐसा जातक बहुत ही हिम्मत वाला होता है, विद्वान होता है, निरोगी रहने वाला, सभा में सभी को मोहित करने वाला, भाग्यवान तथा शत्रुओं का नाश होता है। ऐसा जातक अपनी युवावस्था में बहुत कष्ट उठाता है। अपने पड़ोसी व भाई-बहिनों से हमेशा मानसिक मतभेद रखता है।

यहाँ पर शनि यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक अपने भाइयों के लिये कष्टकारक होता है तथा बहिनों को भी उनके वैवाहिक जीवन में कष्ट उठाना पड़ता है। कई मामलो में बहिन विधवा अथवा भाई की मृत्यु होती देखि गयी है, इसलिये जातक को ऐसी स्थिति आने पर बहिनों तथा भाई की पत्नी व बच्चों का भरण-पोषण करना होता है।
शनि यदि स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो भाई की मृत्यु तो नहीं होती परन्तु आपसी विवाद बहुत होते हैं। सम्पत्ति के लिये विवाद हाता है जिसे सुलझाने के लिये न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। सभी भाई यदि एक साथ रहते हैं तो किसी की भी उन्नति नहीं होती तथा संतान बाधा भी आती है।

यदि सभी भाई अलग अलग रहना शुरू कर दे तो सभी की तरक्की हो सकती है, यहाँ शनि के साथ राहू भी हो तो जातक उन्नति तो बहुत करता है परन्तु विद्या प्राप्त नहीं हो पाती हे। यदि शनि तुला अथवा कन्या राशि में हो तो विवाह के बाद जातक की स्थिति अधिक खराब हो जाती है। चलता उद्योग बन्द हो जाता है।

नोट: उपरोक्त लिखे सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में अन्य ग्रहों की स्थिति के कारण फल में विभिन्नता हो सकती है !

अगला अध्याय – शनि चतुर्थ भाव में

पिछला अध्याय – शनि दूसरे भाव में