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कुंडली के दसवे भाव में शनि जातक को जन्म स्थान से दूर उन्नति देता है। पैतृक सम्पत्ति मिलना मुश्किल होता है। यदि किसी योग से पैतृक संपत्ति मिल जाये तो किसी न किसी कारण से वह समाप्त हो जाती है। अन्त में जातक स्वयं अपनी ही मेहनत से पुनः सम्पत्ति बना लेता हे।

दसवे भाव में स्थित शनि जातक को विद्वान बनता है, राजनीति में सफल व राज्य से लाभ प्राप्त करने वाला, ज्योतिष में रुचि अथवा वख्यात ज्योतिष हो सकता है, मेहनती और सभी से न्याय की बात करने वाला तथा धार्मिक होता है परन्तु उदर रोग से पीड़ित रहता है !

शनि के प्रभाव से जातक के जीवन को अचानक उन्नति व अचानक ही अवनति का सामना करना पड़ता है।ऐसा जातक अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में उन्नति व उच्च पद प्राप्त करने वाला, लेखक, भावुक, अति महत्त्वाकांक्षी तथा अपने व्यवसाय में सफल रहता है।

दसवा भाव पिता का भाव होता है इसलिए जातक के अपने पिता से मानसिक मतभेद होते हैं। शनि वक्री हो तो माता-पिता की कम आयु में मृत्यु हो सकती है ! या किसी अन्य कारण से जातक को माता पिता से अलग होना पड़ता है ! जातक पिता के साथ रहे तो किसी की भी उन्नति नहीं होती है, पिता की मृत्यु के बाद अवश्य जातक की उन्नति होती है। पिता को भी पहले समस्त प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। वह व्यापार में भी हानि उठाता है, यहाँ तक कि यदि किसी गलत कार्य में सम्मिलित हो तो कारावास भी भुगतना पड़ता है !

इस भाव में शनि यदि अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) अथवा जल तत्व (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तथा न्याय क्षेत्र में सफल हो जाता है। शनि यदि पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) अथवा वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) राशि में हो तो जातक धार्मिक क्षेत्र में अधिक सफल होता है। वह लेखन कार्य में भी यश प्राप्त करता है। पत्रिका में गुरु व बुध भी शुभ हों तो जातक ज्योतिषी के रूप में यश प्राप्त करता है।

नोट : उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है !

अगला अध्याय – शनि ग्यारहवे भाव में

पिछला अध्याय – शनि नवम भाव में

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