शनि कुंडली के पाचवे भाव में क्या फल प्रदान करता है ?

शनि कुंडली के पाचवे भाव में

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पंचम (संतान व विद्या भाव)- शनि जब कुंडली के पाचवे स्थान में स्थित हो तो शनि की कारक वस्तुओं के क्षेत्र में सफलता मिल सकती है परन्तु शिक्षा की गारन्टी नहीं है। जातक सभी पर सन्देह करता है, सभी की पीठ के पीछे बुराई करना इसका मुख्य गुण होता है। जातक विद्वान हो सकता है। यदि गुरु शभ प्रभाव में हो और पंचम भाव का स्वामी भी शुभ स्थिति में हो तो विद्या पूर्ण तो हो जाती है लेकिन अवरोध फिर भी आते हैं।

कुंडली के पाचवे भाव में भाव में शनि जातक को विद्वान, संतान युक्त, अधिक भ्रमण करने वाला, आलसी व चंचल प्रवृत्ति का बनाता है।पाचवे भाव के मुख्य कारक विद्या व संतान के लिये शनि किसी भी राशि में हो लेकि अवरोध व विलम्ब अवश्य करता है जिसमें जातक को संतान प्राप्ति में विलम्ब होता है। यदि उसके जीवन साथी की पत्रिका में संतान योग प्रबल हो तो अवश्य संतान समय पर प्राप्त हो जाती है लेकिन शनि के प्रभाव से कुछ विलम्ब तो अवश्य ही होता है। जातक की विद्या प्राप्ति में अवरोध व विलम्ब अवश्य होता है। कारण जातक को सट्टे-लाटरी तथा व्यवसाय से हानि होती है।

शनि यदि जल तत्व (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो संतान शीघ्र होती है। संख्या भी अधिक होती है। ऐसा जातक अपने श्रम से ही सम्पत्ति अर्जित करता है। वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) राशि का शनि अवश्य जातक को उच्च शिक्षा प्राप्त करवाता है। गुरु व शुक्र की स्थिति भी शुभ होने पर जातक न्याय के क्षेत्र में सफलता प्रापत करता है।

शनि इस भाव में यदि अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) राशि में हो तो जातक अवश्य शिक्षा पूर्ण करता है परन्तु मेरे अनुभव में धनु राशि अपवाद है। इस राशि का शनि शिक्षा पूर्ण ही नहीं होने देता।वह अपने जीवनसाथी पर भी अविश्वास के कारण सदैव उसके पीछे लगा रहता है। अपने मन की बात किसी पर प्रकटर नहीं होने देता है। ऐसे जातक के संतान तो अधिक होती है परन्तु जीवित नहीं रहती है। यदि जीवनसाथी की पत्रिका के प्रभाव से संतान जीवित रह भी जाये तो जातक के सामने ही मृत्यु को प्राप्त होती है।

पुरुष की पत्रिका में शनि के पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में होने पर जातक साधारण रूप से जीवनयापन करता है। उसका स्वभाव रूखा परन्तु सबका प्रिय होता है। उसकी पत्नी के रोगी होने के कारण वह स्व्यं दूसरे विवाह की अनुमति देती है परन्तु शिक्षा व संतान सुख फिर भी कम ही मिलता है।

नोट : उपरोक्त लिखे गए शनि के फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों की स्तिथि के अनुसार फल में विभिन्नता हो सकती हो !

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