Saturn in first house of horoscope

शनि के प्रभाव कुंडली के पहले भाव में

वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि कुंडली के पहले  भाव में क्या फल प्रदान करता है तथा जातक पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है ?

प्रथम भाव- शनि जब कुंडली के प्रथम भाव में होता है तो जातक को कुरूप, अभिमानी, आलसी, बुरे विचार वाला होता है, बाल्यावस्था में पीड़ित में अधिकतर पीड़ित रहता है तथा स्वार्थी, एकान्तवासी, सदैव दूसरों का अहित सोचने वाला और धर्म के क्षेत्र में भी अलग विचार रखता है। शनि यदि वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) राशि मे हो तो जातक व्यावहारिक, परिश्रमी, धार्मिक विचार वाला परन्तु आर्थिक क्षेत्र में अस्थिर होता है।

पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि का शनि जातक को चिढ़चिढ़ा स्वभाव, दूसरों से जलने वाला, शंकित स्वभाव का बनाता है। मकर राशि में व्यक्ति लोभी, दूसरों का धन हड़पने में कुशल, लालची तथा कंजूस बनाता है। शनि यदि तुला, मीन, धनु, मकर व कुंभ राशि में हो तो जातक राज्य अथवा समाज में सम्मान प्राप्त करने वाला, परिश्रमी, धनवान, गम्भीर स्वभाव का विद्वान तथा किसी सामाजिक संस्था में उच्च पद प्राप्त करने वाला होता है। शनि यदि किसी अन्य प्रभाव में आता है तो जातक को मूत्र विकार, वात विकार, पाचन में समस्या तथा किसी दुर्घटना के कारण सिर में चोट लगती है। यदि मंगल भी मारक होकर पीड़ित हो तो मृत्यु भी सम्भव है।

शनि यदि अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) राशि में हो तो जातक सभी से प्रेम से मिलने वाला, सरल हृदयी परन्तु अपनी बात सही सिद्ध करने के लिये झगड़ा करने वाला व बहस में भी वह आगे रहता है।प्रथम भाव में शनि केवल तुला व मकर राशि में ही शुभ फल देता है अन्यथा अन्य राशियों में अधिकतर अशुभ फल ही देता है। मेरे विचार में शायद यह भाव नैसर्गिक रूप से मेष राशि व पूर्व दिशा का प्रतिनिधित्व करता है तथा मेष राशि में शनि नीचत्व प्राप्त करता है व पूर्व दिशा में शनि का दिग्बल क्षीण होता है, इसलिये इस भाव में अशुभ फल देता हे।

उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है , कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के विभिन्न स्थिति के अनुसार फलों में विभिन्नता हो सकती है !

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