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सप्तम भाव (जीवनसाथी भाव) कुंडली का सातवा भाव शनि की दिशा [ पश्चिम दिशा ] को दर्शाता है, इसलिये शनि को यहाँ दिग्बल प्राप्त होता है। इस भाव के शनि के प्रभाव से जातक बहुत आलसी और बेकार में भटकने वाला होता है ! उसके जीवन में सुख व धन की कमी होती हैजातक काफी चिड़चिड़े स्वभाव का होता है तथा बिना बात के क्रोध करने वाला होता है, शनि की दसवीं दृष्टि चौथे भाव के कारण जातक गलत सांगत में तथा गलत कार्यो में लिप्त हो जाता है !, पापी स्वभाव का, विलासी प्रवृत्ति का तथा स्त्री भक्त होता है। इसके साथ ही वैवाहिक जीवन में दुःखी, जीवनसाथी अधिक व व्यर्थ का व्यय करने वाला होता है। इस कारण से उससे वैचारिक मतभेद रहते हैं। शनि सप्तम स्थान में होने से विवाह में विलम्भ और जीवन साथी की उम्र अधिक हो सकती है !

शनि के जल तत्व (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में होने पर जीवनसाथी समस्त प्रकार से अच्छा मिलता है परन्तु विवाह के बाद आर्थिक समस्या बनी रहती है। ऐसे में जातक यदि व्यापारी हो तो व्यवसाय में हानि और नौकरी में हो तो जल्दी-जल्दी स्थानान्तरण होते रहते हैं।

शनि यदि इस भाव में पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में हो तो जीवनसाथी साधारण रंग-रूप का प्राप्त होता है। द्यिविवाह योग निर्मित होता है। जीवन में स्थिरता द्वितीय विवाह के बाद आती है।

अग्नि तत्व (मेष, सिंह व धनु) राशि में शनि के प्रभाव से जीवनसाथी सुन्दर व रोबीले शरीर वाला मिलता है। वायु तत्व (मिथुन, तुला व कुंभ) राशि में शनि के प्रभाव से जीवनसाथी विचित्र तेज लिये, गोल चेहरा, गेरा रंग व मध्यम लम्बा कद का होता है। स्वभाव कुछ उग्रता लिये होत है।

शनि यदि अग्नि अथवा वायु राशि में हो तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है तथा आजीविकास के क्षेत्र में विशेषकर न्याय के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।

शनि यदि किसी स्त्री की पत्रिका में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु व मीन) में हो तो स्त्री का विवाह अपने से अधिक आयु वाले व्यक्ति के साथ होता है अथवा जिससे विवाह होता है वह विधुर होता है।

शनि यदि पृथ्वी या जल तत्व राशि में हो तो जातक को ठेकेदारी अथवा शनि की कारक वस्तुओं के व्यापार से लाभ मिलात है। शनि किसी भी राशि में क्यों न हो, ऐसे जातक को शनि उपासना अवश्य करनी चाहिये जिसके प्रभाव से जातक शारीरिक तथा वैवाहिक रूप से समस्याग्रस्त न हो।

नोट: उपरोक्त लिखे गए सभी फल वैदिक ज्योतिष के आधार पर लिखे गए है, कुंडली में स्थित अन्य ग्रहों के प्रभाव से फल में विभिन्नता हो सकती है !

अगला अध्याय – शनि आठवे भाव में

पिछला अध्याय – शनि छटे भाव में

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