शुक्र कुंडली के चौथे भाव में

शुक्र कुंडली के चौथे भाव में

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चतुर्थ (सुख भाव)- इस भाव के शुक्र के प्रभाव से जातक दीर्घायु, भाग्यवान, परोपकारी, विलासी प्रवृत्ति, ईश्वर में विश्वास, सभी से अच्छा व्यवहार करने वाला व पुत्रवान होता है। ऐसा जतक भवन-वाहन का पूर्ण सुख भोगता है। वह भूमि के साथ माता से भी लाभ प्राप्त करता है। अपने निवास व कार्यालय को भी भौतिक वस्तुओं से अपनी इच्छानुसार सजाता है। उसका गृहस्थ जीवन प्रायः शान्त ही होता है।

मैंने इस शुक्र ?पर जो शोध किया है उसके अनुसार ऐसे शुक्र पर यदि किसी पाप ग्रह का प्रभाव हो तो जातक का किसी एक से अवैध सम्बन्ध होता है। यहाँ पर शुक्र यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जातक को माता का तथा स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो पिता का पूर्ण सुख कभी भी एक साथ नहीं मिलता है। इसमें कुछ भी कारण हो सकता है, चाहे मृत्यु हो अथवा दोनों में विवाद हो।

यहाँ पर शुक्र यदि नीच अथवा शत्रुक्षेत्री हो तो जातक को अशुभ फल अधिक मिलते हैं, जिसमें माता को कष्ट अथवा बाल्यकाल में माँ की मृत्यु होना भवन-वाहन की हानि होती है। शुक्र यदि जल तत्व (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो जातक को स्वयं के निवास का सुख नहीं मिलता है। पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में जातक का पुनर्विवाह करवाता है। यहाँ का शुक्र सामान्यतः जातक को कंजूस परन्तु स्वयं के ऊपर खर्च करने वाला, स्वार्थी, मधुर बोल कर कार्य सिद्ध करने में कुशल तथा बिना कार्य के किसी को नहीं पूछता है। जातक को पैतृक सम्पत्ति मिलती है लेकिन वह उसको भोग-विलास में शीघ्र ही समाप्त कर देता है।

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