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शुक्र कुंडली के तीसरे भाव में

शुक्र कुंडली के तीसरे भाव में

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तृतीय (पराक्रम भाव)- इस भाव में शुक्र के प्रभाव से जातक सुखी, धनवान परन्तु उच्चस्तरीय कंजूस, विद्वान, चित्रकार, पराक्रम से भरा हुआ, भाग्यशाली तथा पर्यटन प्रेमी होता है। ऐसे व्यक्ति के कई भाई-बहिन होते हैं। लेखन कार्यों में यश प्राप्त करता है। ऐसे जातक के किसी भी यात्रा में किसी से प्रणय सम्बन्ध का योग होता है। इस भाव में शुक्र यदि अकेला हो तो अशुभ फल की अधिक उम्मीद होती है लेकिन यदि सूर्य प्रथम अथवा पंचम भाव में हो तो कुछ शुभ फल की आशा होती है।

शुक्र यदि स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में हो तो जातक के विवाह में अवरोध आते हैं व वैवाहिक जीवन में भी क्लेश रहता है। द्विविवाह का भी योग होता है। उसका पुनर्विवाह तलाकशुदा अथवा विधवा या विधुर से होता है। ऐसा जातक काम-वासना से इतना अधिक पीड़ित होता है कि वह किसी से भी सम्बन्ध बना सकता है। इसमें जातक स्त्री अथवा पुरुष कोई भी हो सकता है। ऐसे जातक को विपरीत लिंगी सदैव सन्देह से देखते हैं। जातक के कन्या सन्तति नहीं होती है।

पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में शुक्र होने पर जातक को जीवनसाथ्ज्ञी सुन्दर मिलता है परन्तु वह अवैध सम्बन्ध अवश्य बनाता है। इस भाव के शुक्र पर यदि शनि की दृष्टि हो तो जातक को कर्ण रोग होता है। यदि मंगल का प्रभाव हो तो जातक के अवश्य ही अवैध सम्बन्ध होते हैं। ऐसा जातक शारीरिक सुख के लिये धन भी व्यय करता है। उसके इसी व्यसन के कारण धन संचय नहीं होता है, कार्य व्यवसाय में भी स्थिरता नहीं रहती है। शुक्र के साथ यदि शनि हो तो फिर जातक सीमा के अन्दर ही गलत कार्य करता है। वह भी केवल जीवन के आरम्भ में और जहाँ उसे एक-दो चोट लगती है, वह तुरन्त सुधर जाता है।

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