राहु सातवे भाव में

सप्तम (जीवनसाथी भाव)- राहू कुंडली के सातवे भाव में अच्छे फल नहीं देता। यह भाव जीवनसाथी भाव के साथ मारक भाव भी है। इस भाव में राहू के प्रभाव से जातक को जीवनसाथी सदैव अस्वस्थ रहने वाला व क्लेशी प्रवृत्ति का मिलता है। जातक स्वयं भ्रमणशील, वात रोग से कष्ट, चतुर बुद्धि, लालची प्रवृत्ति व […]

राहु छटे भाव में

षष्ठ (शत्रु व रोग भाव)- कुंडली के छटे भाव में राहु अच्छे फल प्रदान करता है। इस भाव में राहु जातक को बहुत ही प्रभावशाली व पराक्रमी बना देता है। कुंडली का छठा भाव शत्रु भाव होता है तो राहु जातक को शत्रु अथवा विरोधियों से भी लाभ दिलवाता है। वह सदैव बड़े-बड़े कार्य करता […]

राहु चौथे भाव में

चतुर्थ (सुख भाव)- कुंडली का चौथा भाव माता , विद्या, सुख भाव होता है।यदि राहू इस भाव में हो तो जातक को दुखी, असन्तोष, माता से क्लेश करने वाला, क्रूर स्वभाव, कम बोलने वाला, जूठ बोलने वाला, विदेशी भाषा का ज्ञान, पिता को आर्थिक रूप से हानि देने वाला होता है। राहू चौथे भाव में […]

राहु तीसरे भाव में

तृतीय (पराक्रम भाव)- कुंडली के तीसरे भाव में राहु अच्छे फल प्रदान करता है, ऐसा जातक विद्वान तथा एक अच्छा व्यापारी होता है।परन्तु पराक्रम से हीन होता है, पक्के विचार वाला, बलवान व योगाभ्यासी होता है। इस राहू के प्रभाव से जातक की प्रथम संतान किसी प्रकार से सदा के लिये दूर होते देखा है। […]

राहु दूसरे भाव में

द्वितीय (धन भाव)- राहु यदि कुंडली के दित्तीय भाव में स्थित हो तो जातक को विदेश में रहने वाला अथवा परिवार से दूर होता है ! उसके बच्चे कम अथवा परिवार छोटा होता है ! राहु दित्तीय भाव में वाणी को कठोर बनता है क्योकि कुंडली का द्वितीय भाव वाणी भाव भी होता है , […]

राहु पहले भाव में

प्रथम भाव- पहले भाव में राहू यदि शुभ प्रभाव में हो तो जातक ज़मीन से आसमान की उचाईयों को छूता है। पहले भाव में राहु शिक्षा में अवश्य अवरोध उत्त्पन्न करता है परन्तु जातक को समाज में उच्च पद व सम्मान दिलवाता है। वह ये स्थान अचानक व शीघ्रता से प्राप्त करता है। राहु यदि […]