शनि छटे भाव में

छठा भाव (शत्रु व रोग भाव)- कुंडली के छटे भाव में यदि शनि के साथ लग्नेश भी शुभ प्रभाव में हो तो जातक अत्यधिक धनवान व समस्त प्रकार के वैभव से युक्त होता है।ऐसा जातक डेयरी के व्यवसाय में सफल रहता है, इस व्यवसाय के माध्यम से जातक अपने जीवन व समाज में सभी प्रकार […]

शनि पाचवे भाव में

पंचम (संतान व विद्या भाव)- शनि जब कुंडली के पाचवे स्थान में स्थित हो तो शनि की कारक वस्तुओं के क्षेत्र में सफलता मिल सकती है परन्तु शिक्षा की गारन्टी नहीं है। जातक सभी पर सन्देह करता है, सभी की पीठ के पीछे बुराई करना इसका मुख्य गुण होता है। जातक विद्वान हो सकता है। […]

शनि पहले भाव में

प्रथम भाव- शनि जब कुंडली के प्रथम भाव में होता है तो जातक को कुरूप, अभिमानी, आलसी, बुरे विचार वाला होता है, बाल्यावस्था में पीड़ित में अधिकतर पीड़ित रहता है तथा स्वार्थी, एकान्तवासी, सदैव दूसरों का अहित सोचने वाला और धर्म के क्षेत्र में भी अलग विचार रखता है। शनि यदि वायु तत्व (मिथुन, तुला […]

शनि दूसरे भाव में

द्वितीय (धन भाव)- कुंडली के दूसरे भाव में शनि अच्छे फल नहीं देता। परन्तु ऐसा जातक अपने जीवन में कई बार आर्थिक व सामाजिक समस्याओं का सामना करता है , समाज से विरक्त रहता है तथा जातक अपने घमण्डी स्वभाव के कारण व्यवसाय में भी असफल रहता है। तथा उचित अवसर खो देता है ! […]

शनि चौथे भाव में

चतुर्थ भाव में शनि यदि अपनी राशि में हो या उच्च की राशि में हो तो कुंडली में पंच महापुरुष योग का निर्माण होता है और इस योग के कारण जातक को ३५ वर्ष की आयु के पश्चात् ऐसी कामयाबी मिलती है की जातक अपने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता ! जातक धनवान, […]

शनि तीसरे भाव में

तृतीय (पराक्रम भाव)- कुंडली के तीसरे भाव में शनि अधिकतर अच्छे फल प्रदान करता है। ऐसा जातक बहुत ही हिम्मत वाला होता है, विद्वान होता है, निरोगी रहने वाला, सभा में सभी को मोहित करने वाला, भाग्यवान तथा शत्रुओं का नाश होता है। ऐसा जातक अपनी युवावस्था में बहुत कष्ट उठाता है। अपने पड़ोसी व […]